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जीवन के विविध रंगों से रंगा-” तरे गांव मड़ई “

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    छत्तीसगढ़ का ऐसा मड़ई जहां होते हैं आज भी गंधर्व विवाह ।                                   

राजेश श्रीवास्तव पंडरिया 

कबीरधाम के तरेगांव ग्राम में बैगाओं का लगने वाला मड़ई अंचल का सबसे वृहद मेला होता है । यहां बैगाओं के लोकजीवन के तमाम रंग देखने को मिलते हैं। परम्पराओं का निर्वहन होता है और विभिन्न माध्यमों से मनोरंजन किया जाता है । कबीरधाम जिले के बोड़ला विकास खण्ड से 25 किलोमीटर उत्तर दिशा में मैकल श्रृंखला की सुरम्य वादियों में स्थित तरेगांव जंगल नामक वन्यग्राम में बैगाओं का लगने वाला सबसे विशाल मड़ई होता है । सागौन के घने जंगलों से घिरे इस वनप्रान्तर मे लगने वाले इस मड़ई का बैगाजन जाति बेसब्री से इंतजार करते हैं । अगहन मास में लगने वाले इस मड़ई में दूरदराज के गहन वनों में निवास करने वाले बैगा अपनी आवश्यकताओं की वस्तुएं खरीदने के लिए आते है .!


प्रमुख आयोजन :- तरे गांव के इस मड़ई में दूरदराज के व्यापारी यहाँ दैनिक उपयोग की वस्तुएं लेकर आते हैं । इस दिन बैगा गांव में सम्भावित हैजा , धुंकि, क्षय , हैजा बडे माता आदि व्याधियों और विपत्तियों को दूर करने के निमित्त गांव बांधता है ।अनेक ग्रामों की ग्रामदेवियाँ ,देवता अपने सेवकों के साथ मड़ई आते हैं । उनकी ध्वजा एक बड़े बांस को सजाकर बनाई जाती है, इस ध्वजा को निशान कहा जाता है । मड़ई में विभिन्न ग्रामों के सेवक अपने निशान को दूसरे ग्राम के निशान सर भेंट करवाते है । यहां हाट बाजार के साथ खेल तमाशे आते हैं । इस मड़ई में बड़े-बड़े तांत्रिक- मांत्रिक , बैगा-गुनियाँ अपने खैर एवं गढ़ों की बाते आपस मे हल करते हैं ।

इसे सलाह पूछना कहते हैं । गरीबी के बावजूद मड़ई में घरों के लिए आवश्यक खरीददारी का काम प्रायः महिलाएं ही करती हैं , जिसमे मटके , हंडिया, लोहे के बर्तन,तम्बाकू, कपड़े, गहने आदि की खरीददारी करते हैं । बैगा जनजातियों में मड़ई का शाब्दिक अर्थ ” मड़वा” (मंडप)होता है ।जहां वे अपना शुभ कार्य सम्पन्न करते हैं । किवदन्तियों के मुताबिक इसी दिन बैगाओं के आराध्य ” दौगन गुरु” का विवाह गंगाईंन माई से हुआ था । हिन्दू धर्म मे इसे कार्तिक एकादशी, देवउठनी , गौरागौरी , शिवपार्वतीविवाह के रूप में मनाते हैं ।


मड़ई में गंधर्व विवाह:-इस मड़ई में बैगा जनजाति के युवक-युवतियों में गन्धर्व विवाह करने की प्रथा का चलन है । अगर बैगिन युवती किसी समवयस्क युवक पर आसक्त होती है, तब युवक के गले मे डाले हुए गमछे को पकड़ कर उसकी हो जाने की मनुहार करती है । युवक अगर पूर्व से विवाहित होता है तब वह हाथ जोड़कर उसे अपनी बहन स्वीकार करता है और मेले के लिए ख़र्चपानी देता है ।
एक-दूसरे के राजी हो जाने पर युवक अपने टोले के साथियों और युवती की सहेलियों की सहमति से उसे अपनी सहचरी मान लेता है और अपने घर ले आता है । युवती की सहेलियों की सूचना पर उसके पिता वर के गांव जाकर नेंग करता है । इस तरह गन्धर्व विवाह संपन्न होता है ।


मनोरंजन के माध्यम:– मांदर , ढोल नगाड़े , ठिसकी,थाल ,झांझ आदि वाद्य यंत्रों के जरिये गायन और वादन तथा नृत्यकला में समा बांध देते है । प्रकृति , वन, नदियाँ, चंदा-सूरज, खेत खलिहान, शादी ब्याह ,सुंदर बच्चे, पशु पक्षी आदि प्रिय विषयों पर इनके गीत होते हैं,जिसे गायन की अलग अलग विधाओं में अभिव्यक्त करते हैं।


रीना, बिलमा, ददरिया, करमा, आदि गायन में पुरुष और स्त्रियां पारंगत होते है । लोकगीतों की परंपरा में इनके वाक्य विन्यास अद्वितीय होते हैं । बैगिन स्त्रियों में गुदने का प्रचलन है जबकि पुरुष गुदना नही गुदवाते । अत्यधिक उम्र के बैगा-बैगिन के केश सफेद नही होते, इनके आंखों की ज्योति भी तीव्र होती है । इन्हें भौतिक संसाधनों की आवश्यकता नही होती । अत्यंत सरल ,सरस् , भोलेभाले वनपुत्र आज भी अपनी रूढ़िजन्य परम्पराओं में विश्वास रखते हैं , इन्हें आधुनिक सभ्यता का रोग नही होता ।

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About sanjeev shukla

Sanjeev Shukla DABANG NEWS LIVE Editor in chief 7000322152
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