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सबसे बड़ा सवाल – आखिर बिलासपुर जिला रेडी टू ईट समूहों के मूल्यांकन पर क्यों कर रहा लेट लतीफी ?

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रेडी टू ईट योजना के मूल्यांकन में हो रही देरी से अधिकारियों की बल्ले बल्ले ।

अडंगा डाल समूहों को चुस्त दुरूस्त करने का मिल गया मोैका । लेकिन तैयारी के बाद होने वाले मूल्यांकन से क्या हासिल होगा ?

दबंग न्यूज लाईव
बुधवार 13.01.2021

 

बिलासपुर महिला एवं बाल विकास विभाग की एक बड़ी ही महत्वपूर्ण योजना है रेडी टू ईट । इस योजना के तहत विभाग आंगनबाड़ी में दर्ज गर्भवती ,शिशुवती महिलाओं के साथ ही बच्चों के बेहतर पोषण के लिए रेडी टू ईट माह में दो बार प्रदान करता है । यहां तक तो सब ठीक है । लेकिन पूरा गड़बड़झाला इसी के बाद से शुरू होता है ।

फाईल फोटो ।

महिलाओं तथा बच्चों को ये पैकेट भले ही मुफ्त में वितरित किए जाते हों लेकिन सरकार हर पैकेट के पचास रू. की दर से रेडी टू ईट बनाने वाले समूहों को राशि का भुगतान करती है । 2009 से प्रदेश में ये योजना लागू है लेकिन आज तक इस योजना का मूल्यांकन सरकार ने नहीं करवाया है । सरकार ने आज तक ये जानने की कोशिश नहीं की है कि इस योजना के बाद प्रदेश की महिलाओं तथा बच्चों के सेहत पर क्या प्रभाव पड़ा ? ये जानने की भी कोशिश नहीं हुई कि क्या इस योजना के बाद वाकई में कुपोषण कम हुआ है ? सरकार ने ये भी जानने की कोशिश नहीं की कि जो समूह रेडी टू ईट का निर्माण कर रहे हैं क्या वे तय मापदंडो का पालन करते हैं ? और सबसे बड़ा सवाल क्या रेडी टू ईट हितग्राहियों तक पहुंचता है और उसका उपयोग हितग्राही करते हैं ?

फाईल फोटो ।

लेकिन जो जानकारी प्राप्त हुई है उसके अनुसार सरकार एक स्वतंत्र एजेंसी से इस बारे में मूल्यांकन करवाने वाली है । ये मूल्यांकन प्रदेश के कई जिलों में चल रहे हैं लेकिन बिलासपुर जिले के जिला परियोजना अधिकारी ने इस मूल्यांकन की राह में कई रोडे़ अटका कर इसे लगभग एक माह पिछे कर दिया है और इसका जो कारण समझ आता है वो यही है कि अधिकारी तत्काल मूल्यांकन नहीं करवाना चाहते थे । एक माह कीे लेट लतीफी से अधिकारियों को अपने समूहों को अपडेट करने का समय मिल गया है ।


अंदरूनी सूत्रों से जो जानकारी प्राप्त हुई है उसके अनुसार जिले में लगभग सभी समूहों को युद्ध स्तर पर अपडेट करने का काम इस दौरान कर लिया गया है । रिकार्ड से लेकर स्टाक तक अधिकारियों ने पूरा करवा लिया है ताकि अब यदि मूल्यांकन हों तो सब कुछ ठीक ठाक मिले ।

लेकिन सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसी तैयारियों के बाद समूहों के और योजनाओं के मूल्यांकन के बाद सरकार कौन सा आंकड़ा और कैसा आंकड़ा इकट्ठा करना चाहती है और इससे क्या हासिल होगा ?

फाईल फोटो ।

लेकिन जितनी मेहनत अधिकारियों ने इन पंद्रह बीस दिनों में समूहों को अपडेट करने में की काश उससे आधी ही मेहनत इस योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए कर लेते तो शायद योजना का लाभ हितग्राहियों को मिल जाता और तबेले में दस रू में बिकने वाला रेडी टू ईट हितग्राहियों तक पहुंचता ।

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