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छत्तीसगढ़ में शिक्षक पढ़ाएँ या पोर्टल भरें? ऑनलाइन काम के बोझ तले दब रही शिक्षा व्यवस्था ।

कोटा में शिक्षा विभाग चल रहा एबीओ के भरोसे , बीईओ को आफिस आने की फुर्सत ही नहीं ।

दबंग न्यूज लाईव
शनिवार 17 अक्टूबर 2026
बिलासपुर – छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था फिलहाल इन दिनों वेंटिलेटर पर है । बच्चे स्कूलों में आते जरूर हैं लेकिन उनकी पढ़ाई को लेकर जिम्मेदार शिक्षक पढ़ाई छोड़ दिगर कामों में अपना समय लगाते हैं नतीजा स्कूली शिक्षा ठप्प । इन दिनों स्कूल के शिक्षक अपना ज्यादातर समय मोबाईल और लैपटाप पर आनलाईन कामों में लगा रहे हैं । । लगभग 20 से अधिक ऑनलाइन कार्यों जिनमें छात्रवृत्ति , जाति प्रमाण पत्र के साथ ऐसे कई कार्य हैं जिनकी जिम्मेदारी शिक्षकों पर है हद्द तो ये हो गई है कि 16 अक्टूबर को निकले आदेश में 19 अक्टूबर का समय इन कामों को पूरा करने के लिए दिया गया यदि समय सीमा पर छात्रवृत्ति के फॉर्म नहीं जमा होंगे तो वेतन रोकने की चेतावनी तक शिक्षकों को दे दी गई है । और मजे की बात ये आदेश बीईओ ने नहीं एबीईओ ने निकाला है सूत्रों की मानें तो बीईओ साहब को आफिस आने की फुर्सत ही नहीं है ।

छत्तीसगढ़ की सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के सामने आज बड़ा सवाल है कि वे बच्चों को पढ़ाएँ या दिनभर ऑनलाइन पोर्टल पर जानकारी भरने, दस्तावेज जुटाने और विभागीय आदेशों का पालन करने में समय बिताएँ? जुलाई से अक्टूबर तक लगातार बढ़ते ऑनलाइन कार्यों ने शिक्षकों की व्यस्तता बढ़ा दी है। इसका असर नियमित अध्यापन और शैक्षणिक गुणवत्ता पर पड़ने की आशंका है।

20 से अधिक ऑनलाइन कार्यों का दबाव
शिक्षकों को APAAR ID, UDISE 2026-27, पौधारोपण की फोटो अपलोड एवं जियो टैगिंग, गणवेश-पाठ्यपुस्तक वितरण,DBT, निपुण भारत एवं DBT ट्रैकर, मध्यान्ह भोजन (PM POSHAN), सरस्वती साइकिल योजना, परीक्षा परिणाम, पालक-शिक्षक बैठक की रिपोर्टिंग, विभिन्न योजनाओं की जानकारी और ऑनलाइन प्रशिक्षण जैसे अनेक कार्य करने पड़ रहे हैं। अलग-अलग पोर्टलों पर जानकारी दर्ज करने तथा निर्धारित समय-सीमा में कार्य पूरा करने के दबाव से नियमित पढ़ाई के लिए समय निकालना कठिन हो रहा है। पहले से शिक्षकों की कमी झेल रहे विद्यालयों में यह समस्या और गंभीर है।

छात्रवृत्ति और जाति प्रमाण पत्र की जिम्मेदारी
पूर्व मैट्रिक एवं पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति के ऑनलाइन आवेदनों के लिए विद्यार्थियों के जाति-आय प्रमाण पत्र, आधार, बैंक खाता, समग्र आईडी, ।च्।।त् प्क् और अंकसूची सहित आवश्यक दस्तावेजों का मिलान करना पड़ता है। आवेदन प्रक्रिया की बताई गई समय-सीमा 13 से 30 अक्टूबर के बीच होने के कारण शिक्षकों पर अतिरिक्त दबाव है। दस्तावेजों में त्रुटि, इंटरनेट की समस्या और अभिभावकों से जानकारी मिलने में देरी के कारण आवेदन पूरा करने में कठिनाई आती है।

जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए भी शिक्षकों को अभिभावकों से संपर्क कर दस्तावेज जुटाने, प्रपत्र भरवाने और आवेदन तैयार कराने में समय देना पड़ता है। शिक्षकों की शिकायत है कि आवेदन तहसील या राजस्व कार्यालय में जमा होने के बाद उसकी स्थिति और आगे की कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी विद्यालयों को नहीं मिलती। कई मामलों में पुराने दस्तावेजों का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने से वही प्रक्रिया दोबारा करनी पड़ती है।

आवेदन के बाद की कार्रवाई की जवाबदेही भी तय हो
जिला प्रशासन और संबंधित विभागों को यह समीक्षा करनी चाहिए कि कितने आवेदन प्राप्त हुए, कितने जाति प्रमाण पत्र जारी किए गए और कितने प्रकरण लंबित हैं। पहले से जमा आवेदनों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार कर विद्यालयों को स्थिति उपलब्ध कराई जाए। दस्तावेजों की कमी होने पर संबंधित कार्यालय स्पष्ट जानकारी दें, ताकि पूरी प्रक्रिया दोहराने के बजाय केवल आवश्यक कमियाँ दूर की जा सकें। आवेदन के सत्यापन और प्रमाण पत्र जारी करने की जिम्मेदारी संबंधित सक्षम अधिकारियों की भी सुनिश्चित होनी चाहिए।

ऑनलाइन प्रशिक्षण और वेतन रोकने की चेतावनी पर सवाल
शिक्षकों को ऑनलाइन प्रशिक्षण, मॉड्यूल पूरा करने और प्रमाण पत्र प्राप्त करने जैसे कार्य भी निर्धारित समय में करने होते हैं। प्रशिक्षण उपयोगी है, लेकिन उसके लिए पर्याप्त समय देना जरूरी है। इसी तरह कार्य समय पर पूरा नहीं होने पर वेतन रोकने की चेतावनी देने के बजाय वास्तविक कठिनाइयों, तकनीकी समस्याओं, दस्तावेजों की अनुपलब्धता और संबंधित कार्यालयों में लंबित मामलों की समीक्षा होनी चाहिए। किसी भी कार्रवाई में नियमों का पालन और संबंधित कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना आवश्यक है।

समाधान के लिए एकीकृत पोर्टल और डाटा एंट्री ऑपरेटर जरूरी
सरकार को गैर-शिक्षकीय कार्यों का बोझ कम करने के लिए आवश्यकतानुसार डाटा एंट्री ऑपरेटर उपलब्ध कराने चाहिए। अलग-अलग पोर्टलों पर एक ही जानकारी बार-बार भरने की व्यवस्था समाप्त कर एकीकृत डिजिटल प्रणाली विकसित की जाए। छात्रवृत्ति और जाति प्रमाण पत्र के मामलों में शिक्षा तथा राजस्व विभाग की जिम्मेदारियाँ स्पष्ट हों। ऑनलाइन प्रशिक्षण के लिए अलग समय निर्धारित किया जाए और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाए।

विकासखंड एवं जिला स्तर के अधिकारियों को केवल पोर्टल पर दर्ज आँकड़ों की समीक्षा तक सीमित न रहकर कक्षाओं में वास्तविक अध्यापन, विद्यार्थियों के सीखने के स्तर और विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता पर भी ध्यान देना चाहिए।

शिक्षक को शिक्षक बने रहने दीजिए। शिक्षा व्यवस्था की सफलता ऑनलाइन प्रविष्टियों और रिपोर्टों की संख्या से नहीं, बल्कि बच्चों के सीखने और आगे बढ़ने से तय होती है। यदि सरकार सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारना चाहती है, तो शिक्षकों की कमी दूर करने, गैर-शिक्षकीय कार्यभार कम करने, डिजिटल प्रक्रियाओं को सरल बनाने और विभागों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। आखिर शिक्षक का प्राथमिक दायित्व बच्चों का भविष्य सँवारना है, न कि दिनभर पोर्टल भरते रहना।

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