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हीमोफोलिया यानी शरीर से खून बहने के प्रदेश में 600 मरीज पर इलाज नहीं यानी मौत तय ।

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देश में इसके एक लाख से अधिक मरीज, रायपुर जिले में 80 मरीज पंजीकृत जिसमें 70 पुरुष

महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में ज्यादा होती है ये बीमारी

 

दबंग न्यूज लाईव
सोमवार 21.12.2020

श्याम अग्रवाल

Raipur –  हीमोफीलिया बीमारी छत्तीसगढ़ में नासूर बनने के कगार पर है। इस बीमारी में पीड़ित के शरीर से कभी भी रक्त बहने लगता है जो बंद नहीं होता। ऐसा रक्त में प्रोटीन कम होने या न हगोने के कारण होता है। बीमारी का दर्दनाक पहलू ये है कि इसे दवाओं या इंजेक्शन से रोका तो जा सकता है पर बीमारी को समूल नष्ट नहीं किया जा सकता यानी लाइलाज है। इसके पूरे भारत में 1,33,000 मरीज हैं वहीं छत्तीसगढ़ में 600 मरीज व रायपुर जिले में 80 मरीज पंजीकृत हैं।

प्रदेश में इलाज के अभाव में हीमोफीलिया के मरीज भटक रहे हैं। पंजाब, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र जैसे प्रदेश में इसका इलाज सरकारी अस्पतालों में आसानी से हो रहा है पर छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों में इसकी दवा न होने से पीड़ितों को मौत का डर लगातार बढ़ता जा रहा है। हिमोफिलिया सोसायटी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अशोक दुबे जो कि खुद इस बीमारी से ग्रसित हैं, ने बताया कि मेडिकल कॉलेज में भी इस बीमारी के विशेषज्ञ डॉक्टर तक उपलब्ध नहीं हैं। यह बीमारी महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में ज्यादा पाई जाती है। रायपुर जिले में पंजीकृत 80 मरीजों में से 70 मरीज पुरुष ही हैं।

इस जानलेवा बीमारी से निपटने के लिए प्रदेश में कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे इस रोग से ग्रसित मरीजों को पड़ोसी राज्य पर निर्भर होना पड़ रहा है। महंगा होने के कारण इलाज आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की पहुंच से कोसों दूर है क्योंकि एक बार में दवा पर करीब हर माह 50 हजार से 1 लाख रुपए खर्च होते हैं। दवाएं भी महंगी हैं।

रायगढ़ में एक तो रायपुर जिले में इससे तीन मौतें हो चुकीं, इलाज के लिए 14 एकड़ खेत तक बिक गया

कुछ दिन पहले रायगढ़ जिले के पुसौर निवासी राहुल यादव जो हीमोफीलिया से ग्रस्त था, की मौत मात्र 18 साल की उम्र में हो गई। रायगढ़ मेडिकल कॉलेज में उसे फैक्टर (प्लाज्मा से बनने वाला इंजेक्शन यानी एक तरह की वैक्सीन) नहीं मिल पाया। वहीं रायपुर जिले के धरसींवा विधानसभा के परसतराई गांव के शिवमंगल साहू के 6 माह, 4 वर्ष व 7 वर्ष के तीन बच्चों का पिछले 2 वर्ष के अंदर इसी बीमारी से निधन हो गया। उन्हें भी फैक्टर नहीं मिल पाया। अब उनका एक 8 वर्ष का बालक बचा है, जो खुद भी इस बीमारी से पीड़ित है। बच्चों के इलाज के लिए शिवमंगल को 14 एकड़ खेत तक बेचना पड़ा।

मेकाहारा में वैक्सीन होने का दावा पर प्रबंधन का इंकार

हिमोफिलिया सोसायटी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अशोक दुबे ने बताया कि 2018 में बिलासपुर हाईकोर्ट में अपील की गई। हाईकोर्ट ने भी माना कि इस जानलेवा बीमारी का इलाज छत्तीसगढ़ में होना चाहिए। बाद में सीएम भूपेश बघेल व स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव से भी मांग गई तब रायपुर सीजीएमसी में फैक्टर उपलब्ध हो पाया, जो मेकाहारा सुपरिटेंडेंट डॉ. विनीत जैन के निर्देश के बिना नहीं मिलेगा। डॉ. दुबे ने बताया कि सीजीएमसी (छत्तीसगढ़ मेडिकल कार्पोरेशन) में दवा उपलब्ध होने पर एक कोड जनरेट होता है। इसकी वैक्सीन का कोड डी 215 व डी 216 है। इधर डॉ. विनीत जैन इस वैक्सीन के उपलब्ध होने से साफ इंकार करते हैं।

जब शरीर का कोई हिस्सा कट जाता है तो खून में थक्का बनाने के लिए जरूरी घटक रक्त में मौजूद प्लेटलेट्स से मिलकर उसे गाढ़ा कर देते हैं। इससे खून बहना अपने आप रुक जाता है पर जिन लोगों को हीमोफीलिया होता है उनमें थक्का बनाने वाले घटक बहुत कम होते हैं। इसका मतलब उनका खून रुकता नहीं है। हीमोफीलिया दो तरह के होते हैं-हीमोफीलिया-ए में फैक्टर 8 की कमी होती है व हीमोफीलिया-बी में फैक्टर 9 की। दोनों ही खून में थक्का बनाने के लिए जरूरी है। हीमोफीलिया अधिकांश लोगों में जन्म से होता है। कई बार जन्म के बाद ही इसका पता चल जाता है। अगर हीमोफीलिया मध्यम और गंभीर स्तर का है तो बचपन में आंतरिक रक्तस्राव के चलते कुछ लक्षण सामने आने लगते हैं। गंभीर स्तर के हीमोफीलिया में खतरा बहुत ज्यादा होता है। जोर से झटका लगने पर भी आंतरिक रक्तस्राव शुरू हो जाता है। वहीं आड़ा, तिरछा, उल्टा होकर नींद लेना भी बीमारी को बढ़ावा देता है। वही‌ यह बीमारी 5000 लोगों में से एक व्यक्ति को होती है ।

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